जानिए दर्शकों को कितनी पसंद आई ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई विद्युत जामवाल की फिल्म यारा और खुदा हाफिज

By Ek Baat Bata | Aug 24, 2020

1.यारा

भारतीय सिनेमा में कुछ ऐसे मुद्दे जिन पर अगर फिल्में बने तोह दर्शकों को फ़िल्म जरूर भाती है और वो फ़िल्म को देखने के लिए दौड़े-दौड़े चले आते हैं। इन मुद्दों में से एक है 'दोस्ती' दोस्ती पर बनाई गई फिल्में अक्सर लोगों को पसंद आती है उदाहरण के तौर पे शोले, रंग दे बसंती और ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा यह कुछ ऐसी फिल्मी हैं जिसे दर्शकों ने खुल कर प्यार दिया है। इस थीम के ऊपर ही एक ऐसे निर्देशक फ़िल्म ला रहे है जिनका पहले ऐसी थीम से कोई नाता नही रह है उन्होंने इस से पहले कुछ अलग तरह की फिल्मों का निर्देशन किया है जैसी की ‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’ और ‘साहेब बीबी और गैंगस्टर। लेकिन अब तिग्मांशु धुलिया दोस्ती पर एक फ़िल्म लेके आ रहे हैं जिसका नाम है 'यारा' ऐसी फिल्म का निर्देशन तिग्मांशु पहली बार कर रहें हैं। इस फ़िल्म का मुख्य किरदार विद्युत जामवाल निभा रहे हैं। यह फिल्म ओटीटी प्लैटफॉर्म जी5 पर रिलीज हो गयी है। इस फ़िल्म में चार अनाथ दोस्तों की कहानी दर्शायी गई है जिन्हें परिस्थितियां एक जगह लाकर इकट्ठा कर देती हैं और फिर चारों एक साथ धंदा करते है साथ ही जिंदगी के सबक सीखते हैं। इस फ़िल्म की शुरुआत 1950 के दशक से शुरू होती है और 1997 तक चलती है। इस फिल्म में दोस्ती के साथ आजादी के बाद कुछ वर्षों को बहुत ही अच्छी तरह से दर्शाया गया है। उस समय लोगों की परेशानियों की भी झलक इस फिल्म में देखने को मिली है जैसे कि ऊंची जातियों की सामंतवादी सोच, इमरजेंसी, नक्सल आंदोलन जैसी चीजें देखने को मिली हैं। लेकिन इस फिल्म में परेशानी यह है कि कोई भी चीज अंत तक गहराई तक नहीं पहुंच पाती दोस्ती की गर्माहट इस फिल्म में इस तरह नहीं बिखरती कि उसमें दर्शक बिल्कुल खो जाए या अपनापन उन्हें नजर आए। इस फिल्म में नक्सलवाद आंदोलन के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नजरिया तो रखा गया है लेकिन उस नज़रिए को तरीके से पेश नही किया गया। इसी कड़ी में सामंतवादी ढांचे, आपातकाल के संदर्भ भी फिल्म में हैं, लेकिन उन सभी महत्वपूर्ण पलों को फ़िल्म में बहुत ही जल्दी खत्म कर दिया गया है। इस फिल्म में जिन भी बातों को और कहानी को दर्शाने की कोशिश की गई है उसमें असली अहसास पैदा नहीं हो पाता है जिस हिसाब से फिल्म की कहानी को दरकार थी ऐसा उसमें कुछ भी नहीं होता है। साथ ही इस फ़िल्म की पटकथा मजबूत नहीं थी। फिल्म के डायलॉग भी ज्यादा प्रभावित करने वाले नहीं है। फागुन के किरदार को छोड़ दें तो बाकी तीन दोस्तों के किरदारों को ठीक से स्पेस नहीं मिल पाया है। 

वैसे तो तिग्मांशु धुलिया जाने-माने निर्देशकों में से एक है उनकी हर फिल्म दर्शकों को बहुत ही ज्यादा पसंद आती है लेकिन इस फिल्म में वह अपनी साख को बरकरार नहीं रख पाए। जैसे फ़िल्म शुरू होती है तब तो वह लोगों के अंदर थोड़ी एक्साइटमेंट बना देती है, कि हां शायद आगे कुछ होगा लेकिन जैसे ही फिर आगे बढ़ती है वैसे-वैसे ही बिखरती जाती है। अतः इसका क्लाइमैक्स बहुत ही ज्यादा निराश करता है। हालांकि निर्देशक ने फिल्म में बहुत ही उम्दा कलाकारों का चुनाव किया है जैसे कि अमित साद, विजय वर्मा और विद्युत जामवाल, इन सभी की काबिलियत पर किसी भी तरह का शक नहीं किया जा सकता। लेकिन इस फिल्म की स्क्रिप्ट ने उनका साथ नहीं दिया जिसकी वजह से वह अपने किरदार को अच्छी तरह से उबर नहीं पाए। इस फिल्म में खासकर अमित साद अपने किरदार को बिल्कुल भी अच्छी तरह से नहीं निभा पाते। विद्युत जामवाल एक्शन के महारथी हैं और उन्होंने एक्शन वाले दृश्य अच्छे किए हैं, लेकिन उनका भी अभिनय कामचलाऊ ही है। वही संजय मिश्रा की भूमिका फिल्में रखी तो गई है लेकिन बहुत ही ज्यादा छोटी है। उसमें कोई भी वजन नजर नहीं आता।श्रुति हसन भी फिल्में केवल नाम के लिए ही नजर आई हैं उनकी अदाकारी भी इस फिल्म में कोई रंग नहीं डाल पाई। साथ ही केनी बसुमतारी का काम भी ठीक है। बाकी सारे कलाकरो ने भी बस कामचलाऊ ही काम किया है। कुल मिलाकर पूरी फिल्म कभी वर्तमान में घूमती है और कभी फ्लैशबैक में नजर आती है। अंत में यह फिल्म लोगों के ऊपर किसी भी तरह की छाप नहीं छोड़ पाती।

2.खुदा हाफिज

यारा के अलावा विद्युत जामवाल की एक और फिल्म ने दस्तक दी खुदा हाफिज जोकि 14 अगस्त को रिलीस हुई। विद्युत जमाल की फिल्म को ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज किया गया। लोगों को इस फिल्म से और विद्युत जामवाल से बहुत ज्यादा उम्मीदें थी। जिस तरह से सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद नेपोटिज्म को पीछे धकेला जा रहा था और रियल टैलेंट या सेल्फ मेड एक्टर्स को आगे लाने की कोशिश की जा रही थी। इन सभी बातों से लोगों को विद्युत जामवाल और उनकी मूवी से बहुत सारी उम्मीदें थी। हालांकि यह फिल्म दर्शकों को ज्यादा लुभा नहीं पाई है। यह फिल्म एक सच्ची घटना से प्रेरित है साल 2008 में मंदी के बैकड्राप पर आधारित है। इस फिल्म की कहानी लखनऊ के शादीशुदा दंपत्ति समीर और नरगिस की है जॉब की तलाश में नरगिस का किरदार प्ले कर रही शिवालिका नोमान जाती हैं और वहां पर वह देह व्यापार के गिरोह का शिकार हो जाती है। इस फिल्म का मुख्य किरदार समीर के रूप में विद्युत जामवाल निभा रहे हैं। पत्नी का प्यार समीर को विदेशी सरजमीं पर खींच लाता है यहां शुरू होती है नरगिस को भारत वापस लाने की कहानी। लोगों को विद्युत जमाल से जैसी उम्मीदें थी वह इन सभी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं इनकी कई ऐसी चीजें हैं जो दर्शकों को काफी निराश करती है। जिस तरह से फिल्म का नाम है और यह सच्ची घटना पर आधारित है इसके अंदर सस्पेंस की काफी ज्यादा कमी नजर आई है। जिस तरह से शुरुआत में फिल्म को संजीदा रूप दिया जाता है बीच में आकर वह सारी चीजें खराब हो जाती है। फिल्म के अंदर सस्पेंस की कमी होने की वजह से फिल्म दर्शकों से सही तरह से जुड़ नहीं पाती। इस फिल्म के किरदारों से यह झलक के आता है कि विद्युत और विदेश में समीर की मदद करने वाले उस्‍मान यानी अन्‍नू कपूर पर ही पूरी फिल्म टिकी हुई है। इस फिल्म की मुख्य अभिनेत्री नरगिस फिल्में में होकर भी उनका किरदार पूरी फिल्म में एक कैमियो की तरह ही नजर आया।

इस फिल्म में एक्शन सींस का काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है लोगों को पता है कि विद्युत एक्शन के बहुत ही बड़े खिलाड़ी है उनके लिए एक्शन सींस करना बहुत ही आसान बात है।फिल्म के अंदर एक्शन सींस के काफी सारे सीन फरमाए गए हैं। जिस तरह से फिल्म की स्टोरी है उस तरह से फिल्म के डायरेक्टर फारुख कबीर इसे दशा नहीं दे पाते, शुरू में फिल्म में ट्रेलर दिखाने की कोशिश की गई है अतः डायरेक्टर इस फिल्म को एकथ्रिलर फिल्म की तरह दशकों तक पहुंचा नहीं पाते। जिस तरह से विद्युत जामवाल का एक्शन मास्टर में नाम है और वह अपने इसी खूबी के लिए जाने जाते हैं इसका इस्तेमाल इस फिल्म में बिल्कुल भी नहीं करवाया गया। आम आदमियों वाले ही एक्शन विद्युत से करवाएंगे जोकि दर्शकों को बिल्कुल भी पसंद नहीं आए। नरगिस की खोज आधे में आम आदमी के नजरिए से तो आधे में रैंबो स्‍टाइल में नज़र आये। फिल्म के अंदर कुछ अच्छा है तो वह उसके गाने, फिल्म के गाने काफी अच्छी तरह से लिखें और गाए गए हैं यह दर्शकों का दिल छू जाते हैं। इस फ़िल्म में नोमान और बैतूसेफ को उज्‍बेकिस्‍तान में रीक्रिएट किया गया है, लेकिन सिनेमैटोग्राफर वहां की खूबसूरती और बंजर पन को कैद करने में काफी सूख गए है। गाने के सीन देखकर यह लगता है कि वह काफी जल्द बाजी में शॉर्ट लिए गए हैं। कुल मिलाकर फिल्म धीमी रफ्तार से अपनी मंजिल तक पहुंच गई लेकिन फिल्म का संदेश बहुत ही ज्यादा पार्क और साफ था कि प्यार सच्चा हो तो मंदी हो या कोई मुसीबत इंसान उसे जीत ही लेता है।