बच्चा कई बार खेलते-खेलते खिलौनों से बात करने लगता है। ऐसे में कई पेरेंट्स को लगता है कि उनके बच्चे का दिमागी संतुलन सही नहीं है। लेकिन ऐसा असल में नहीं है। कई रिसर्च में इसको बहुत नॉर्मल व्यवहार कहा गया है। एक्सपर्ट के मुताबिक बच्चों का खिलौनों से बात करना उनके मेंटल और इमोशनल डेवलमेंट का नॉर्मल हिस्सा है। इस उम्र में खिलौनों को बच्चे अपना दोस्त मान लेते हैं। वह अपनी कल्पना शक्ति का इस्तेमाल कर रहा होता है।
खिलौनों से बात करने का मतलब
जब बच्चा बड़ा होता है, तो वह बोलना सीखता है और अपनी काल्पनिक दुनिया में जीता है। इसको साइकोलॉजी में इमेजिनेटिव प्ले कहा जाता है। खिलौनों से बात करना उनकी इमेजिनेशन और क्रिएटिव थिंकिंग होती है। ऐसे बच्चों का दिमाग अक्सर तेज होता है।
पेरेंट्स कब करें चिंता
जब बच्चा किसी से बिल्कुल बात न करें।
अगर बच्चा हर वक्त अकेला रहे और खिलौनों से बातें करे।
बच्चा दिमाग पर जोर डालने लगे।
अगर 5-6 साल के बाद भी बच्चा काल्पनिक दुनिया का फर्क न समझ पाए।
बच्चे की डेवलपमेंट
बता दें कि यह बच्चे की पहली दूसरी स्टेज है। जब बच्चा चीजों को समझकर बोलने की कोशिश करता है। बच्चा इमोशनल डेवलपमेंट के दौर में होता है। क्योंकि वह खिलौनों को भी अपना दोस्त समझने लगता है। उम्र के साथ यह व्यवहार बदलता रहता है। ऐसे में पेरेंट्स को चिंता करने की जरूरत नहीं है।
पेरेंट्स क्या करें
बच्चे से बात करें और उनकी बातों को सुनना चाहिए।
बच्चे के साथ खेलें और उनसे कुछ सवाल पूछें।
बच्चे की कल्पनाओं को निखरने दें।
भरोसे और प्यार का माहौल बनाए रखें।